बचपन

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छोटा सा ही था तब मैं जब
भाग भाग कर जाया करता
जमी रेत को खोद सीपियाँ
एक ओर मटमैली, गन्दी
एक ओर चिकनी, चमकीली
छोटी- बड़ी निकाला करता.
छोटे-छोटे नदी के घोंघे
(शंख बुलाता था तब उनको)
उन्हें साथ ले आया करता.

बहुत महकते थे वो सड़कर
छिप कर उन्हें साफ फिर करता
मोम जामे का थैला था एक
उसी में रहता था सब संचित
बच्चे का अनमोल खज़ाना

लाल रेत में छुपे हैं होते
छोटे-बड़े अनगिनत पत्थर
कुछ चिकने, खुरदुरे से भी कुछ
बहुरंगी, कुछ एक रंग के
बालू वाले की दुकान पर
फिंकी रेत से खोद, उठा कर

एक खज़ाना और बनाता
एक खज़ाना और बढाता.

गत्ते वाली कॉपी थी एक
कुछ पतली सी,
छिपा-छिपा कर रंगता उसके पन्नों को मैं
कुछ रंगों, कुछ चिन्हों से मैं.
कुछ कवितायेँ लिख रक्खीं थीं
उन पन्नों पर.

फ़ेंक आया वो सभी खजाने
सीपी, पत्थर, सब कवितायेँ
सब अनमोल
सब मूल्यहीन भी;
पड़े हैं अब भी, वहीँ पे शायद
इंतज़ार करते सब उसका
जिसके लिए खज़ाना हैं वो.

Note: Thanks to <http://hindi.changathi.com>; that I was able to post my Hindi poem. I don’t know how to type in Hindi, although I write in it!

Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivs 3.0 Unported License.

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