ज़िन्दगी

DSC01214

मिट गए पदचिन्ह कल के
धीरे धीरे,
छा गयी एक धुंध
वर्तमान की.
दौड़ती है ज़िन्दगी
एक याद से एक याद तक.
दौड़ता है आदमी भी
तेज़, साथ इस ज़िन्दगी के.
अब कहाँ है समय
थमने का?
ना रहा अब समय
देखने का, मुड़कर
पीछे.
दौड़ते रहो या कुचले जाओ
उस वर्तमान से
जो कभी थमता नहीं.

वक्त आता है वो के जब
रुक जाता है आदमी
और छटती है धुंध.
फिर है देता दिखाई
गुज़रा कल
धुंधला ही सा थोडा –
फिर दिखाई देने लगता
है अतीत
दूर से.
दर्द ना रहा अब,
छूट जाने का.
सिर्फ एहसास है
चलने का दूर तक,
देर तक,
समय की सड़क पर.
चला है आदमी जिस पर हमेशा.
चलते रहना है आगे ही,
अनुमति जो नहीं:
मुड़ने की,
थमने की,
जमने की
अगर है – तो सिर्फ …

Note: Thanks to <http://hindi.changathi.com>; that I was able to post my Hindi poem. I don’t know how to type in Hindi, although I write in it!

Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivs 3.0 Unported License.

Advertisements

2 thoughts on “ज़िन्दगी

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s